उस दिव्य विमानपर बैठकर ध्रुवजी त्रिलोकीको पारकर सप्तर्षिमण्डलसे भी ऊपर भगवान् विष्णुके नित्यधाममें पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की॥ ३५॥
त्रिलोकीं देवयानेन सोऽतिव्रज्य मुनीनपि।
परस्ताद्यद् ध्रुवगतिर्विष्णोः पदमथाभ्यगात्॥ ३५
उस दिव्य विमानपर बैठकर ध्रुवजी त्रिलोकीको पारकर सप्तर्षिमण्डलसे भी ऊपर भगवान् विष्णुके नित्यधाममें पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 471) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/12/35/