॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.12.37
शान्ताः समदृशः शुद्धाः सर्वभूतानुरंजनाः।
यान्त्यञ्जसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवाः॥ ३७
śāntāḥ samadṛśaḥ śuddhāḥ sarvabhūtānuraṃjanāḥ|
yāntyañjasācyutapadamacyutapriyabāndhavāḥ|| 37
अर्थ
जो शान्त, समदर्शी, शुद्ध और सब प्राणियोंको प्रसन्न रखनेवाले हैं तथा भगवद्भक्तोंको ही अपना एकमात्र सच्चा सुहृद् मानते हैं—ऐसे लोग सुगमतासे ही इस भगवद्धामको प्राप्त कर लेते हैं॥ ३७॥