॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.12.49
पौर्णमास्यां सिनीवाल्यां द्वादश्यां श्रवणेऽथवा।
दिनक्षये व्यतीपाते सङ्क्रमेऽर्कदिनेऽपि वा॥ ४९
paurṇamāsyāṃ sinīvālyāṃ dvādaśyāṃ śravaṇe'thavā|
dinakṣaye vyatīpāte saṅkrame'rkadine'pi vā|| 49
अर्थ
भगवान्के परम पवित्र चरणोंकी शरणमें रहनेवाला जो पुरुष इसे निष्कामभावसे पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, संक्रान्ति अथवा रविवारके दिन श्रद्धालु पुरुषोंको सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मामें ही सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है॥ ४९-५०॥✎ 384