॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.13.21
विदुर उवाच
तस्य शीलनिधेः साधोर्ब्रह्मण्यस्य महात्मनः।
राज्ञः कथमभूद्दुष्टा प्रजा यद्विमना ययौ॥ २१
tasya śīlanidheḥ sādhorbrahmaṇyasya mahātmanaḥ|
rājñaḥ kathamabhūdduṣṭā prajā yadvimanā yayau|| 21
अर्थ
विदुरजीने पूछा—ब्रह्मन्! महाराज अंग तो बड़े शीलसम्पन्न, साधुस्वभाव, ब्राह्मण-भक्त और महात्मा थे। उनके वेन-जैसा दुष्ट पुत्र कैसे हुआ, जिसके कारण दुःखी होकर उन्हें नगर छोड़ना पड़ा॥ २१॥