श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

मन्ये महाभागवतं नारदं देवदर्शनम्।

येन प्रोक्तः क्रियायोगः परिचर्याविधिर्हरेः॥ ३

manye mahābhāgavataṃ nāradaṃ devadarśanam|

yena proktaḥ kriyāyogaḥ paricaryāvidhirhareḥ|| 3

अर्थ

भगवान्‌के दर्शनसे कृतार्थ नारदजी परम भागवत हैं—ऐसा मैं मानता हूँ। उन्होंने पांचरात्रका निर्माण करके श्रीहरिकी पूजापद्धतिरूप क्रियायोगका उपदेश किया है॥ ३॥✎ 386

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #386 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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