श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.12

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तद्विद्वद्भिरसद‍्वृत्तो वेनोऽस्माभिः कृतो नृपः।

सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत्॥ १२

tadvidvadbhirasadvṛtto veno'smābhiḥ kṛto nṛpaḥ|

sāntvito yadi no vācaṃ na grahīṣyatyadharmakṛt|| 12

अर्थ

हमने जान-बूझकर दुराचारी वेनको राजा बनाया था। किन्तु यदि समझानेपर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोकके धिक्कारसे दग्ध हुए इस दुष्टको हम अपने तेजसे भस्म कर देंगे।’ ऐसा विचार करके मुनिलोग वेनके पास गये और अपने क्रोधको छिपाकर उसे प्रिय वचनोंसे समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे॥ १२-१३॥✎ 1602

यह अर्थ श्लोक 12–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1602 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समझ-कर → समझकर

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