श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः।

इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः॥ १८

yasya rāṣṭre pure caiva bhagavān yajñapūruṣaḥ|

ijyate svena dharmeṇa janairvarṇāśramānvitaiḥ|| 18

अर्थ

जिसके राज्य अथवा नगरमें वर्णाश्रम-धर्मोंका पालन करनेवाले पुरुष स्वधर्मपालनके द्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले उस राजासे भगवान् प्रसन्‍न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्‍वकी आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतोंके रक्षक हैं॥ १८-१९॥

यह अर्थ श्लोक 18–19 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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