अहो! जिनकी कृपासे इसे ऐसा ऐश्वर्य मिला, उन श्रीहरिकी निन्दा अभागे वेनको छोड़कर और कौन कर सकता है’?॥ ३३॥✎ 3881603
को वैनं परिचक्षीत वेनमेकमृतेऽशुभम्।
प्राप्त ईदृशमैश्वर्यं यदनुग्रहभाजनः॥ ३३
अहो! जिनकी कृपासे इसे ऐसा ऐश्वर्य मिला, उन श्रीहरिकी निन्दा अभागे वेनको छोड़कर और कौन कर सकता है’?॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 481) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/14/33/
टिप्पणियाँ
३
प्रा० पा०—तं।
(मुद्रित पृष्ठ 481)
४
प्रा० पा०—परिरक्षेत।
(मुद्रित पृष्ठ 481)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#388 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्की