॥ श्रीहरिः ॥
तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम्।
निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत्॥ ४५
taṃ tu te'vanataṃ dīnaṃ kiṃ karomīti vādinam|
niṣīdetyabruvaṃstāta sa niṣādastato'bhavat|| 45
अर्थ
उसने बड़ी दीनता और नम्रभावसे पूछा कि ‘मैं क्या करूँ?’ तो ऋषियोंने कहा—‘निषीद (बैठ जा)।’ इसीसे वह ‘निषाद’ कहलाया॥ ४५॥
तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम्।
निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत्॥ ४५
उसने बड़ी दीनता और नम्रभावसे पूछा कि ‘मैं क्या करूँ?’ तो ऋषियोंने कहा—‘निषीद (बैठ जा)।’ इसीसे वह ‘निषाद’ कहलाया॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 482) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/14/45/