सूतगण! अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मोंके द्वारा लोकमें अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अबतक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसकी प्रशंसा की जा सके। तब तुमलोगोंसे बच्चोंके समान अपनी कीर्तिका किस प्रकार गान करावें?॥ २६॥
वयं त्वविदिता लोके सूताद्यापि वरीमभिः।
कर्मभिः कथमात्मानं गापयिष्याम बालवत्॥ २६
सूतगण! अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मोंके द्वारा लोकमें अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अबतक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसकी प्रशंसा की जा सके। तब तुमलोगोंसे बच्चोंके समान अपनी कीर्तिका किस प्रकार गान करावें?॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.15.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 485) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/26/