श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.15.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया।

इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी॥ ६

eṣa sākṣāddhareraṃśo jāto lokarirakṣayā|

iyaṃ ca tatparā hi śrīranujajñe'napāyinī|| 6

अर्थ

पृथुके रूपमें साक्षात् श्रीहरिके अंशने ही संसारकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और अर्चिके रूपमें, निरन्तर भगवान्‌की सेवामें रहनेवाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मीजी ही प्रकट हुई हैं॥ ६॥✎ 390 1997

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #390 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1997 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दाँतोवाली → दाँतोंवाली

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