श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

मातृभक्तिः परस्त्रीषु पत्न्यामर्ध इवात्मनः।

प्रजासु पितृवत्स्निग्धः किङ्करो ब्रह्मवादिनाम्॥ १७

mātṛbhaktiḥ parastrīṣu patnyāmardha ivātmanaḥ|

prajāsu pitṛvatsnigdhaḥ kiṅkaro brahmavādinām|| 17

अर्थ

ये परस्त्रीमें माताके समान भक्ति रखेंगे, पत्नीको अपने आधे अंगके समान मानेंगे, प्रजापर पिताके समान प्रेम रखेंगे और ब्रह्मवादियोंके सेवक होंगे॥ १७॥

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