श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

सा दिशो विदिशो देवी रोदसी चान्तरं तयोः।

धावन्ती तत्र तत्रैनं ददर्शानूद्यतायुधम्॥ १६

sā diśo vidiśo devī rodasī cāntaraṃ tayoḥ|

dhāvantī tatra tatrainaṃ dadarśānūdyatāyudham|| 16

अर्थ

दिशा, विदिशा, स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्षमें जहाँ-जहाँ भी वह दौड़कर जाती, वहीं उसे महाराज पृथु हथियार उठाये अपने पीछे दिखायी देते॥ १६॥✎ 1329

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1329 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शरणा-गतवत्सल → शरणागतवत्सल

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