श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

मां विपाट्याजरां नावं यत्र विश्‍वं प्रतिष्ठितम्।

आत्मानं च प्रजाश्चेमाः कथमम्भसि धास्यसि॥ २१

māṃ vipāṭyājarāṃ nāvaṃ yatra viśvaṃ pratiṣṭhitam|

ātmānaṃ ca prajāścemāḥ kathamambhasi dhāsyasi|| 21

अर्थ

मैं तो एक सुदृढ़ नौकाके समान हूँ, सारा जगत् मेरे ही आधारपर स्थित हैं। मुझे तोड़कर आप अपनेको और अपनी प्रजाको जलके ऊपर कैसे रखेंगे?’॥ २१॥

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