इस समय महाराज पृथु कालकी भाँति क्रोधमयी मूर्ति धारण किये हुए थे। उनके ये शब्द सुनकर धरती काँपने लगी और उसने अत्यन्त विनीतभावसे हाथ जोड़कर कहा॥ २८॥
एवं मन्युमयीं मूर्तिं कृतान्तमिव बिभ्रतम्।
प्रणता प्राञ्जलिः प्राह मही संजातवेपथुः॥ २८
इस समय महाराज पृथु कालकी भाँति क्रोधमयी मूर्ति धारण किये हुए थे। उनके ये शब्द सुनकर धरती काँपने लगी और उसने अत्यन्त विनीतभावसे हाथ जोड़कर कहा॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 491) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/17/28/