॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.17.33
सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि-
र्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभिः ।
तस्मै समुन्नद्धनिरु१द्धशक्तये
नमः परस्मै पुरुषाय वेधसे॥ ३३
sargādi yo'syānuruṇaddhi śaktibhi-
rdravyakriyākārakacetanātmabhiḥ |
tasmai samunnaddhaniruddhaśaktaye
namaḥ parasmai puruṣāya vedhase|| 33
अर्थ
आप ही पंचभूत, इन्द्रिय, उनके अधिष्ठातृ देवता, बुद्धि और अहंकाररूप अपनी शक्तियोंके द्वारा क्रमशः जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। भिन्न-भिन्न कार्योंके लिये समय-समयपर आपकी शक्तियोंका आविर्भाव-तिरोभाव हुआ करता है। आप साक्षात् परमपुरुष और जगद्विधाता हैं, आपको मेरा नमस्कार है ॥ ३३॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—विरुद्ध०।