श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नूनं जनैरीहितमीश्‍वराणा-

मस्मद्विधैस्तद‍्गुणसर्गमायया ।

न ज्ञायते मोहितचित्तव२र्त्मभि-

स्तेभ्यो नमो वीरयशस्करेभ्यः॥ ३६

nūnaṃ janairīhitamīśvarāṇā-

masmadvidhaistadguṇasargamāyayā |

na jñāyate mohitacittavartmabhi-

stebhyo namo vīrayaśaskarebhyaḥ|| 36

अर्थ

इस त्रिगुणात्मक सृष्टिकी रचना करनेवाली आपकी मायासे मेरे-जैसे साधारण जीवोंके चित्त मोहग्रस्त हो रहे हैं। मुझ-जैसे लोग तो आपके भक्तोंकी लीलाओंका भी आशय नहीं समझ सकते, फिर आपकी किसी क्रियाका उद्देश्य न समझें तो इसमें आश्‍चर्य ही क्या है। अतः जो इन्द्रिय-संयमादिके द्वारा वीरोचित यज्ञका विस्तार करते हैं, ऐसे आपके भक्तोंको भी नमस्कार है॥ ३६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुविजये
धरित्रीनिग्रहो नाम सप्तदशोऽध्यायः
॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—चित्तकर्म०।

    (मुद्रित पृष्ठ 492)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें