श्रीसूतजी कहते हैं—जब विदुरजीने भगवान् वासुदेवकी कथा कहनेके लिये इस प्रकार प्रेरणा की, तब श्रीमैत्रेयजी प्रसन्नचित्तसे उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे॥ ८॥
चोदितो विदुरेणैवं वासुदेवकथां प्रति।
प्रशस्य तं प्रीतमना मैत्रेयः प्रत्यभाषत॥ ८
श्रीसूतजी कहते हैं—जब विदुरजीने भगवान् वासुदेवकी कथा कहनेके लिये इस प्रकार प्रेरणा की, तब श्रीमैत्रेयजी प्रसन्नचित्तसे उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 489) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/17/8/