श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

प्रकल्प्य वत्सं कपिलं सिद्धाः सङ्कल्पनामयीम्।

सिद्धिं नभसि विद्यां च ये च विद्याधरादयः॥ १९

prakalpya vatsaṃ kapilaṃ siddhāḥ saṅkalpanāmayīm|

siddhiṃ nabhasi vidyāṃ ca ye ca vidyādharādayaḥ|| 19

अर्थ

फिर कपिलदेवजीको बछड़ा बनाकर आकाशरूप पात्रमें सिद्धोंने अणिमादि अष्टसिद्धि तथा विद्याधरोंने आकाशगमन आदि विद्याओंको दुहा॥ १९॥✎ 400

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #400 शब्दोंके बीचका स्थान: पात्रमेंमदिरा → पात्रमें मदिरा

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें