परन्तु जो अज्ञानी पुरुष उनका अनादर करके अपने मनःकल्पित उपायोंका आश्रय लेता है, उसके सभी उपाय और प्रयत्न बार-बार निष्फल होते रहते हैं॥ ५॥
ताननादृत्य यो विद्वानर्थानारभते स्वयम्।
तस्य व्यभिचरन्त्यर्था आरब्धाश्च पुनः पुनः॥ ५
परन्तु जो अज्ञानी पुरुष उनका अनादर करके अपने मनःकल्पित उपायोंका आश्रय लेता है, उसके सभी उपाय और प्रयत्न बार-बार निष्फल होते रहते हैं॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 493) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/18/5/