श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

सोऽश्‍वं रूपं च तद्धित्वा तस्मा अन्तर्हितः स्वराट्।

वीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान्॥ १७

so'śvaṃ rūpaṃ ca taddhitvā tasmā antarhitaḥ svarāṭ|

vīraḥ svapaśumādāya pituryajñamupeyivān|| 17

अर्थ

स्वर्गपति इन्द्र उसे पीछे आते देख, उस वेष और घोड़ेको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये और वह वीर अपना यज्ञपशु लेकर पिताकी यज्ञशालामें लौट आया॥ १७॥

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