श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

विनिन्द्यैवं स गिरिशमप्रतीपमवस्थितम्।

दक्षोऽथाप उपस्पृश्य क्रुद्धः शप्तुं प्रचक्रमे॥ १७

vinindyaivaṃ sa giriśamapratīpamavasthitam|

dakṣo'thāpa upaspṛśya kruddhaḥ śaptuṃ pracakrame|| 17

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! दक्षने इस प्रकार महादेवजीको बहुत कुछ बुरा-भला कहा; तथापि उन्होंने इसका कोई प्रतीकार नहीं किया, वे पूर्ववत् निश्‍चलभावसे बैठे रहे। इससे दक्षके क्रोधका पारा और भी ऊँचा चढ़ गया और वे जल हाथमें लेकर उन्हें शाप देनेको तैयार हो गये॥ १७॥

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