॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.2.20
विज्ञाय शापं गिरिशानुगाग्रणी-
र्नन्दीश्वरो रोषकषायदूषितः।
दक्षाय शापं विससर्ज दारुणं
ये चान्वमोदंस्तदवाच्यतां द्विजाः॥ २०
vijñāya śāpaṃ giriśānugāgraṇī-
rnandīśvaro roṣakaṣāyadūṣitaḥ|
dakṣāya śāpaṃ visasarja dāruṇaṃ
ye cānvamodaṃstadavācyatāṃ dvijāḥ|| 20
अर्थ
जब श्रीशंकरजीके अनुयायियोंमें अग्रगण्य नन्दीश्वरको मालूम हुआ कि दक्षने शाप दिया है, तो वे क्रोधसे तमतमा उठे और उन्होंने दक्ष तथा उन ब्राह्मणोंको, जिन्होंने दक्षके दुर्वचनोंका अनुमोदन किया था, बड़ा भयंकर शाप दिया॥ २०॥