महाराज पृथुकी यज्ञशालामें श्रीविष्णुभगवान्का प्रादुर्भाव
मैत्रेय उवाच
भगवानपि वैकुण्ठः साकं मघवता विभुः।
यज्ञैर्यज्ञपतिस्तुष्टो यज्ञभुक् तमभाषत॥ १
bhagavānapi vaikuṇṭhaḥ sākaṃ maghavatā vibhuḥ|
yajñairyajñapatistuṣṭo yajñabhuk tamabhāṣata|| 1
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! महाराज पृथुके निन्यानबे यज्ञोंसे यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुको भी बड़ा सन्तोष हुआ। उन्होंने इन्द्रके सहित वहाँ उपस्थित होकर उनसे कहा॥ १॥
भगवानपि वैकुण्ठः साकं मघवता विभुः।
यज्ञैर्यज्ञपतिस्तुष्टो यज्ञभुक् तमभाषत॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! महाराज पृथुके निन्यानबे यज्ञोंसे यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुको भी बड़ा सन्तोष हुआ। उन्होंने इन्द्रके सहित वहाँ उपस्थित होकर उनसे कहा॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 500) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/20/1/