श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम्।

कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम्॥ ११

udāsīnamivādhyakṣaṃ dravyajñānakriyātmanām|

kūṭasthamimamātmānaṃ yo vedāpnoti śobhanam|| 11

अर्थ

जो पुरुष यह जानता है कि शरीर, ज्ञान, क्रिया और मनका साक्षी होनेपर भी कूटस्थ आत्मा उनसे निर्लिप्त ही रहता है, वह कल्याणमय मोक्षपद प्राप्त कर लेता है॥ ११॥

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