॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.20.11
उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम्।
कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम्॥ ११
udāsīnamivādhyakṣaṃ dravyajñānakriyātmanām|
kūṭasthamimamātmānaṃ yo vedāpnoti śobhanam|| 11
अर्थ
जो पुरुष यह जानता है कि शरीर, ज्ञान, क्रिया और मनका साक्षी होनेपर भी कूटस्थ आत्मा उनसे निर्लिप्त ही रहता है, वह कल्याणमय मोक्षपद प्राप्त कर लेता है॥ ११॥