॥ श्रीहरिः ॥
स इत्थं लोकगुरुणा विष्वक्सेनेन विश्वजित्।
अनुशासित आदेशं शिरसा जगृहे हरेः॥ १७
sa itthaṃ lokaguruṇā viṣvaksenena viśvajit|
anuśāsita ādeśaṃ śirasā jagṛhe hareḥ|| 17
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! सर्वलोकगुरु श्रीहरिके इस प्रकार कहनेपर जगद्विजयी महाराज पृथुने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की॥ १७॥
स इत्थं लोकगुरुणा विष्वक्सेनेन विश्वजित्।
अनुशासित आदेशं शिरसा जगृहे हरेः॥ १७
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! सर्वलोकगुरु श्रीहरिके इस प्रकार कहनेपर जगद्विजयी महाराज पृथुने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 502) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/20/17/