श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

स आदिराजो रचिताञ्जलिर्हरिं

विलोकितुं नाशकदश्रुलोचनः।

न किञ्चनोवाच स बाष्पविक्लवो

हृदोपगुह्यामुमधादवस्थितः ॥ २१

sa ādirājo racitāñjalirhariṃ

vilokituṃ nāśakadaśrulocanaḥ|

na kiñcanovāca sa bāṣpaviklavo

hṛdopaguhyāmumadhādavasthitaḥ || 21

अर्थ

आदिराज महाराज पृथु भी नेत्रोंमें जल भर आनेके कारण न तो भगवान्‌का दर्शन ही कर सके और न तो कण्ठ गद्गद हो जानेसे कुछ बोल ही सके। उन्हें हृदयसे आलिंगन कर पकड़े रहे और हाथ जोड़े ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये॥ २१॥

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