अब लक्ष्मीजीके समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकतासे आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तमकी सेवा ही करना चाहता हूँ। किन्तु ऐसा न हो कि एक ही पतिकी सेवा प्राप्त करनेकी होड़ होनेके कारण आपके चरणोंमें ही मनको एकाग्र करनेवाले हम दोनोंमें कलह छिड़ जाय॥ २७॥✎ 1331
अथाभजे त्वाखिलपूरुषोत्तमं
गुणालयं पद्मकरेव लालसः।
अप्यावयोरेकपतिस्पृधोः कलि-
र्न स्यात्कृतत्वच्चरणैकतानयोः॥ २७
अब लक्ष्मीजीके समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकतासे आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तमकी सेवा ही करना चाहता हूँ। किन्तु ऐसा न हो कि एक ही पतिकी सेवा प्राप्त करनेकी होड़ होनेके कारण आपके चरणोंमें ही मनको एकाग्र करनेवाले हम दोनोंमें कलह छिड़ जाय॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 504) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/20/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1331 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पुरु-षोत्तमकी → पुरुषोत्तमकी