॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.20.30
मन्ये गिरं ते जगतां विमोहिनीं
वरं वृणीष्वेति भजन्तमात्थ यत्।
वाचा नु तन्त्या यदि ते जनोऽसितः
कथं पुनः कर्म करोति मोहितः॥ ३०
manye giraṃ te jagatāṃ vimohinīṃ
varaṃ vṛṇīṣveti bhajantamāttha yat|
vācā nu tantyā yadi te jano'sitaḥ
kathaṃ punaḥ karma karoti mohitaḥ|| 30
अर्थ
मैं भी बिना किसी इच्छाके आपका भजन करता हूँ, आपने जो मुझसे कहा कि ‘वर माँग’ सो आपकी इस वाणीको तो मैं संसारको मोहमें डालनेवाली ही मानता हूँ। यही क्या, आपकी वेदरूपा वाणीने भी तो जगत्को बाँध रखा है। यदि उस वेदवाणीरूप रस्सीसे लोग बँधे न होते, तो वे मोहवश सकाम कर्म क्यों करते?॥ ३०॥✎ 1331