nājyate prakṛtistho'pi tadguṇaiḥ sa mayi sthitaḥ|| 8
अर्थ
जो पुरुष इस देहस्थित आत्माको इस प्रकार शरीरसे भिन्न जानता है, वह प्रकृतिसे सम्बन्ध रखते हुए भी उसके गुणोंसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उसकी स्थिति मुझ परमात्मामें रहती है॥ ८॥
य एवं सन्तमात्मानमात्मस्थं वेद पूरुषः।
नाज्यते प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः स मयि स्थितः॥ ८
जो पुरुष इस देहस्थित आत्माको इस प्रकार शरीरसे भिन्न जानता है, वह प्रकृतिसे सम्बन्ध रखते हुए भी उसके गुणोंसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उसकी स्थिति मुझ परमात्मामें रहती है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 501) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/20/8/