॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.21.16
व्यूढवक्षा बृहच्छ्रोणिर्वलिवल्गुदलोदरः।
आवर्तनाभिरोजस्वी कांचनोरुरुदग्रपात्॥ १६
vyūḍhavakṣā bṛhacchroṇirvalivalgudalodaraḥ|
āvartanābhirojasvī kāṃcanorurudagrapāt|| 16
अर्थ
उनकी छाती चौड़ी, कमरका पिछला भाग स्थूल और उदर पीपलके पत्तेके समान सुडौल तथा बल पड़े हुए होनेसे और भी सुन्दर जान पड़ता था। नाभि भँवरके समान गम्भीर थी, शरीर तेजस्वी था, जंघाएँ सुवर्णके समान देदीप्यमान थीं तथा पैरोंके पंजे उभरे हुए थे॥ १६॥✎ 1332