॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.21.34
असाविहानेकगुणोऽगुणोऽध्वरः
पृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः ।
सम्पद्यतेऽर्थाशयलिंगनामभि-
र्विशुद्धविज्ञानघनः स्वरूपतः॥ ३४
asāvihānekaguṇo'guṇo'dhvaraḥ
pṛthagvidhadravyaguṇakriyoktibhiḥ |
sampadyate'rthāśayaliṃganāmabhi-
rviśuddhavijñānaghanaḥ svarūpataḥ|| 34
अर्थ
भगवान् स्वरूपतः विशुद्ध विज्ञानघन और समस्त विशेषणोंसे रहित हैं; किन्तु इस कर्ममार्गमें जौ-चावल आदि विविध द्रव्य, शुक्लादि गुण, अवघात (कूटना) आदि क्रिया एवं मन्त्रोंके द्वारा और अर्थ, आशय (संकल्प), लिंग (पदार्थ-शक्ति) तथा ज्योतिष्टोम आदि नामोंसे सम्पन्न होनेवाले, अनेक विशेषणयुक्त यज्ञके रूपमें प्रकाशित होते हैं॥ ३४॥