अहो! इस पृथ्वीतलपर मेरे जो प्रजाजन यज्ञ-भोक्ताओंके अधीश्वर सर्वगुरु श्रीहरिका एकनिष्ठभावसे अपने-अपने धर्मोंके द्वारा निरन्तर पूजन करते हैं, वे मुझपर बड़ी कृपा करते हैं॥ ३६॥
अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं
हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्वरम्।
स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका
निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः॥ ३६
अहो! इस पृथ्वीतलपर मेरे जो प्रजाजन यज्ञ-भोक्ताओंके अधीश्वर सर्वगुरु श्रीहरिका एकनिष्ठभावसे अपने-अपने धर्मोंके द्वारा निरन्तर पूजन करते हैं, वे मुझपर बड़ी कृपा करते हैं॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 509) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/21/36/