श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.39

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

यत्सेवयाशेषगुहाशयः स्वराड्

विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्‍वरः।

तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैः

सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम्॥ ३९

yatsevayāśeṣaguhāśayaḥ svarāḍ

viprapriyastuṣyati kāmamīśvaraḥ|

tadeva taddharmaparairvinītaiḥ

sarvātmanā brahmakulaṃ niṣevyatām|| 39

अर्थ

आपलोग भगवान्‌के लोकसंग्रहरूप धर्मका पालन करनेवाले हैं तथा सर्वान्तर्यामी स्वयंप्रकाश ब्राह्मणप्रिय श्रीहरि विप्रवंशकी सेवा करनेसे ही परम सन्तुष्ट होते हैं, अतः आप सभीको सब प्रकारसे विनयपूर्वक ब्राह्मणकुलकी सेवा करनी चाहिये॥ ३९॥

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