श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

स एवमादीन्यनवद्यचेष्टितः

कर्माणि भूयांसि महान्महत्तमः।

कुर्वन् शशासावनिमण्डलं यशः

स्फीतं निधायारुरुहे परं पदम्॥ ७

sa evamādīnyanavadyaceṣṭitaḥ

karmāṇi bhūyāṃsi mahānmahattamaḥ|

kurvan śaśāsāvanimaṇḍalaṃ yaśaḥ

sphītaṃ nidhāyāruruhe paraṃ padam|| 7

अर्थ

महाराज पृथु महापुरुष और सभीके पूजनीय थे। उन्होंने इसी प्रकारके अनेकों उदार कर्म करते हुए पृथ्वीका शासन किया और अन्तमें अपने विपुल यशका विस्तार कर भगवान्‌का परमपद प्राप्त किया॥ ७॥

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