स्वामियो! हमलोग अपने कर्मोंके वशीभूत होकर विपत्तियोंके क्षेत्ररूप इस संसारमें पड़े हुए केवल इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंको ही परम पुरुषार्थ मान रहे हैं; सो क्या हमारे निस्तारका भी कोई उपाय है॥ १३॥
कच्चिन्नः कुशलं नाथा इन्द्रियार्थार्थवेदिनाम्।
व्यसनावाप एतस्मिन् पतितानां स्वकर्मभिः॥ १३
स्वामियो! हमलोग अपने कर्मोंके वशीभूत होकर विपत्तियोंके क्षेत्ररूप इस संसारमें पड़े हुए केवल इन्द्रियसम्बन्धी भोगोंको ही परम पुरुषार्थ मान रहे हैं; सो क्या हमारे निस्तारका भी कोई उपाय है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 513) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/22/13/