श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा-

नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा।

दहत्यवीर्यं हृदयं जीवकोशं१

पञ्चात्मकं योनिमिवोत्थितोऽग्‍निः॥ २६

yadā ratirbrahmaṇi naiṣṭhikī pumā-

nācāryavān jñānavirāgaraṃhasā|

dahatyavīryaṃ hṛdayaṃ jīvakośaṃ

pañcātmakaṃ yonimivotthito'gniḥ|| 26

अर्थ

परब्रह्ममें सुदृढ़ प्रीति हो जानेपर पुरुष सद‍्गुरुकी शरण लेता है; फिर ज्ञान और वैराग्यके प्रबल वेगके कारण वासनाशून्य हुए अपने अविद्यादि पाँच प्रकारके क्लेशोंसे युक्त अहंकारात्मक अपने लिंगशरीरको वह उसी प्रकार भस्म कर देता है, जैसे अग्‍नि लकड़ीसे प्रकट होकर फिर उसीको जला डालती है॥ २६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—पाञ्चकोशं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 515)

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