श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तद्दर्शनोद्गतान् प्राणान् प्रत्यादित्सुरिवोत्थितः।

ससदस्यानुगो वैन्य इन्द्रियेशो गुणानिव॥ ३

taddarśanodgatān prāṇān pratyāditsurivotthitaḥ|

sasadasyānugo vainya indriyeśo guṇāniva|| 3

अर्थ

राजाके प्राण सनकादिकोंका दर्शन करते ही, जैसे विषयी जीव विषयोंकी ओर दौड़ता है, उनकी ओर चल पड़े—मानो उन्हें रोकनेके लिये ही वे अपने सदस्यों और अनुयायियोंके साथ एकाएक उठकर खड़े हो गये॥ ३॥

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