श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.35

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तत्रापि मोक्ष एवार्थ आत्यन्तिकतयेष्यते।

त्रैवर्ग्योऽर्थो यतो नित्यं कृतान्तभयसंयुतः॥ ३५

tatrāpi mokṣa evārtha ātyantikatayeṣyate|

traivargyo'rtho yato nityaṃ kṛtāntabhayasaṃyutaḥ|| 35

अर्थ

इन चार पुरुषार्थोंमें भी सबसे श्रेष्ठ मोक्ष ही माना जाता है; क्योंकि अन्य तीन पुरुषार्थोंमें सर्वदा कालका भय लगा रहता है॥ ३५॥

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