श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तत् त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च

देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम्।

यः क्षेत्रवित्तपतया हृदि विष्वगाविः

प्रत्यक् चकास्ति भगवांस्तमवेहि सोऽस्मि॥ ३७

tat tvaṃ narendra jagatāmatha tasthuṣāṃ ca

dehendriyāsudhiṣaṇātmabhirāvṛtānām|

yaḥ kṣetravittapatayā hṛdi viṣvagāviḥ

pratyak cakāsti bhagavāṃstamavehi so'smi|| 37

अर्थ

अतः राजन्! जो भगवान् देह, इन्द्रिय, प्राण, बुद्धि और अहंकारसे आवृत सभी स्थावर-जंगम प्राणियोंके हृदयोंमें जीवके नियामक अन्तर्यामी आत्मारूपसे सर्वत्र साक्षात् प्रकाशित हो रहे हैं—उन्हें तुम ‘वह मैं ही हूँ’ ऐसा जानो॥ ३७॥

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