॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.22.39
यत्पादपङ्कजपलाशविलासभक्त्या
कर्माशयं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः।
तद्वन्न रिक्तमतयो यतयोऽपि रुद्ध-
स्रोतोगणास्तमरणं भज वासुदेवम्॥ ३९
yatpādapaṅkajapalāśavilāsabhaktyā
karmāśayaṃ grathitamudgrathayanti santaḥ|
tadvanna riktamatayo yatayo'pi ruddha-
srotogaṇāstamaraṇaṃ bhaja vāsudevam|| 39
अर्थ
संत-महात्मा जिनके चरणकमलोंके अंगुलिदलकी छिटकती हुई छटाका स्मरण करके अहंकाररूप हृदयग्रन्थिको , जो कर्मोंसे गठित है, इस प्रकार छिन्न-भिन्न कर डालते हैं कि समस्त इन्द्रियोंका प्रत्याहार करके अपने अन्तःकरणको निर्विषय करनेवाले संन्यासी भी वैसा नहीं कर पाते। तुम उन सर्वाश्रय भगवान् वासुदेवका भजन करो॥ ३९॥