श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

सैनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।

सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति॥ ४५

saināpatyaṃ ca rājyaṃ ca daṇḍanetṛtvameva ca|

sarvalokādhipatyaṃ ca vedaśāstravidarhati|| 45

अर्थ

वास्तवमें तो सेनापतित्व, राज्य, दण्डविधान और सम्पूर्ण लोकोंके शासनका अधिकार वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंको ही है॥ ४५॥

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