श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.47

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यैरीदृशी भगवतो गतिरात्मवादे

एकान्ततो निगमिभिः प्रतिपादिता नः।

तुष्यन्त्वदभ्रकरुणाः स्वकृतेन नित्यं

को नाम तत्प्रतिकरोति विनोदपात्रम्॥ ४७

yairīdṛśī bhagavato gatirātmavāde

ekāntato nigamibhiḥ pratipāditā naḥ|

tuṣyantvadabhrakaruṇāḥ svakṛtena nityaṃ

ko nāma tatpratikaroti vinodapātram|| 47

अर्थ

आपलोग वेदके पारगामी हैं, आपने अध्यात्मतत्त्वका विचार करके हमें निश्चितरूपसे समझा दिया है कि भगवान्‌के प्रति इस प्रकारकी अभेद-भक्ति ही उनकी उपलब्धिका प्रधान साधन है। आपलोग परम कृपालु हैं। अतः अपने इस दीनोद्धाररूप कर्मसे ही सर्वदा सन्तुष्ट रहें। आपके इस उपकारका बदला कोई क्या दे सकता है? उसके लिये प्रयत्न करना भी अपनी हँसी कराना ही है॥ ४७॥

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