समय-समयपर प्रजाजनोंको तृप्त करनेके लिये वे मेघके समान उनके अभीष्ट अर्थोंको खुले हाथसे लुटाते रहते थे। वे समुद्रके समान गम्भीर और पर्वतराज सुमेरुके समान धैर्यवान् भी थे॥ ५८॥
वर्षति स्म यथाकामं पर्जन्य इव तर्पयन्।
समुद्र इव दुर्बोधः सत्त्वेनाचलराडिव॥ ५८
समय-समयपर प्रजाजनोंको तृप्त करनेके लिये वे मेघके समान उनके अभीष्ट अर्थोंको खुले हाथसे लुटाते रहते थे। वे समुद्रके समान गम्भीर और पर्वतराज सुमेरुके समान धैर्यवान् भी थे॥ ५८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.58 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 518) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/22/58/