॥ श्रीहरिः ॥
कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव।
वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः॥ ६१ ✎ 1032
kandarpa iva saundarye manasvī mṛgarāḍiva|
vātsalye manuvannṝṇāṃ prabhutve bhagavānajaḥ|| 61
अर्थ
सौन्दर्यमें कामदेवके समान, उत्साहमें सिंहके समान, वात्सल्यमें मनुके समान और मनुष्योंके आधिपत्यमें सर्वसमर्थ ब्रह्माजीके समान थे॥ ६१॥
कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव।
वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः॥ ६१
सौन्दर्यमें कामदेवके समान, उत्साहमें सिंहके समान, वात्सल्यमें मनुके समान और मनुष्योंके आधिपत्यमें सर्वसमर्थ ब्रह्माजीके समान थे॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 519) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/22/61/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1032 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुवन्नृणां → मनुवन्नॄणां