अब पृथ्वीके स्वामी और अपने प्रियतम महाराज पृथुकी देहको जीवनके चेतना आदि सभी धर्मोंसे रहित देख उस सतीने कुछ देर विलाप किया। फिर पर्वतके ऊपर चिता बनाकर उसे उस चितापर रख दिया॥ २१॥
देहं विपन्नाखिलचेतनादिकं
पत्युः पृथिव्या दयितस्य चात्मनः।
आलक्ष्य किंचिच्च विलप्य सा सती
चितामथारोपयदद्रिसानुनि ॥ २१
अब पृथ्वीके स्वामी और अपने प्रियतम महाराज पृथुकी देहको जीवनके चेतना आदि सभी धर्मोंसे रहित देख उस सतीने कुछ देर विलाप किया। फिर पर्वतके ऊपर चिता बनाकर उसे उस चितापर रख दिया॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 522) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/21/