श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

देहं विपन्‍नाखिलचेतनादिकं

पत्युः पृथिव्या दयितस्य चात्मनः।

आलक्ष्य किंचिच्च विलप्य सा सती

चितामथारोपयदद्रिसानुनि ॥ २१

dehaṃ vipannākhilacetanādikaṃ

patyuḥ pṛthivyā dayitasya cātmanaḥ|

ālakṣya kiṃcicca vilapya sā satī

citāmathāropayadadrisānuni || 21

अर्थ

अब पृथ्वीके स्वामी और अपने प्रियतम महाराज पृथुकी देहको जीवनके चेतना आदि सभी धर्मोंसे रहित देख उस सतीने कुछ देर विलाप किया। फिर पर्वतके ऊपर चिता बनाकर उसे उस चितापर रख दिया॥ २१॥

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