वीरवर पृथु मुनिवृत्तिसे रहते थे। गर्मियोंमें उन्होंने पंचाग्नियोंका सेवन किया, वर्षाऋतुमें खुले मैदानमें रहकर अपने शरीरपर जलकी धाराएँ सहीं और जाड़ेमें गलेतक जलमें खड़े रहे। वे प्रतिदिन मिट्टीकी वेदीपर ही शयन करते थे॥ ६॥
ग्रीष्मे पंचतपा वीरो वर्षास्वासारषाण्मुनिः।
आकण्ठमग्नः शिशिरे उदके स्थण्डिलेशयः॥ ६
वीरवर पृथु मुनिवृत्तिसे रहते थे। गर्मियोंमें उन्होंने पंचाग्नियोंका सेवन किया, वर्षाऋतुमें खुले मैदानमें रहकर अपने शरीरपर जलकी धाराएँ सहीं और जाड़ेमें गलेतक जलमें खड़े रहे। वे प्रतिदिन मिट्टीकी वेदीपर ही शयन करते थे॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 520) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/23/6/