श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ग्रीष्मे पंचतपा वीरो वर्षास्वासारषाण्मुनिः।

आकण्ठमग्नः शिशिरे उदके स्थण्डिलेशयः॥ ६

grīṣme paṃcatapā vīro varṣāsvāsāraṣāṇmuniḥ|

ākaṇṭhamagnaḥ śiśire udake sthaṇḍileśayaḥ|| 6

अर्थ

वीरवर पृथु मुनिवृत्तिसे रहते थे। गर्मियोंमें उन्होंने पंचाग्‍नियोंका सेवन किया, वर्षाऋतुमें खुले मैदानमें रहकर अपने शरीरपर जलकी धाराएँ सहीं और जाड़ेमें गलेतक जलमें खड़े रहे। वे प्रतिदिन मिट्टीकी वेदीपर ही शयन करते थे॥ ६॥

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