राजा प्राचीनबर्हिने ब्रह्माजीके कहनेसे समुद्रकी कन्या शतद्रुतिसे विवाह किया था। सर्वांगसुन्दरी किशोरी शतद्रुति सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे सज-धजकर विवाह-मण्डपमें जब भाँवर देनेके लिये घूमने लगी, तब स्वयं अग्निदेव भी मोहित होकर उसे वैसे ही चाहने लगे जैसे शुकीको चाहा था॥ ११॥✎ 1606
सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्रुतिम्।
यां वीक्ष्य चारुसर्वांगीं किशोरीं सुष्ठ्वलङ्कृताम्।
परिक्रमन्तीमुद्वाहे चकमेऽग्निः शुकीमिव॥ ११
राजा प्राचीनबर्हिने ब्रह्माजीके कहनेसे समुद्रकी कन्या शतद्रुतिसे विवाह किया था। सर्वांगसुन्दरी किशोरी शतद्रुति सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे सज-धजकर विवाह-मण्डपमें जब भाँवर देनेके लिये घूमने लगी, तब स्वयं अग्निदेव भी मोहित होकर उसे वैसे ही चाहने लगे जैसे शुकीको चाहा था॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 525) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)