श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

संगमः खलु विप्रर्षे शिवेनेह शरीरिणाम्।

दुर्लभो मुनयो दध्युरसंगाद्यमभीप्सितम्॥ १७

saṃgamaḥ khalu viprarṣe śiveneha śarīriṇām|

durlabho munayo dadhyurasaṃgādyamabhīpsitam|| 17

अर्थ

ब्रह्मर्षे! शिवजीके साथ समागम होना तो देहधारियोंके लिये बहुत कठिन है। औरोंकी तो बात ही क्या है—मुनिजन भी सब प्रकारकी आसक्ति छोड़कर उन्हें पानेके लिये उनका निरन्तर ध्यान ही किया करते हैं, किन्तु सहजमें पाते नहीं॥ १७॥

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