श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

समुद्रमुप विस्तीर्णमपश्यन् सुमहत्सरः।

महन्मन इव स्वच्छं प्रसन्‍नसलिलाशयम्॥ २०

samudramupa vistīrṇamapaśyan sumahatsaraḥ|

mahanmana iva svacchaṃ prasannasalilāśayam|| 20

अर्थ

चलते-चलते उन्होंने समुद्रके समान विशाल एक सरोवर देखा। वह महापुरुषोंके चित्तके समान बड़ा ही स्वच्छ था तथा उसमें रहनेवाले मत्स्यादि जलजीव भी प्रसन्‍न जान पड़ते थे॥ २०॥

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